Sunday, January 20, 2019

शंकरजयकिशन के गीत और आध्यत्मिकता


मोहब्बत के खुदा हम है......
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वर्ष 1968 में शंकरजयकिशन के संगीत से सजी दिल को स्पर्श करने वाली फ़िल्म ब्रह्मचारी प्रदर्शित हुई थी।इस फ़िल्म के गीतों की लोकप्रियता का यह आलम है कि इसके गीत आज भी गुनगुनाये जा रहे है।इस फ़िल्म में शंकरजयकिशन का संगीत पूर्णिमा के चांद की मानिंद था।इस फ़िल्म को कई अवार्ड भी मिले।शम्मीकपूर तथा राजश्री अभिनीत इस फ़िल्म में एक से बढ़कर एक गीत थे जो प्रायः अब भी सुने जाते है..दिल के झरोखे,में गाउँ तुम सो जाओ,चक्के पे चक्का,आजकल तेरे मेरे..इन गीतों के बाद अन्य गीतों पर घड़ी की सुई अटक सी जाती है।इस फ़िल्म में राजेंद्रकृष्ण का लिखा तथा मोहम्मद रफी का गाया एक तेज गति का उर्जात्मक गीत था....
कोई प्यार हमे भी करता है
हम पर भी कोई मरता है
हमे तुम क्या समझते हो
मोहब्बत के खुदा हम है....
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यह गीत अमीरी व गरीबी में स्पष्ट विभाजन करता है।प्रेम की मजबूत जड़ें गरीबी में ही मिलती है,अमीरी में नही? अमीरी में प्रेम भौतिक संसाधनों के उपर निर्भर करता है किंतु गरीबी में प्रेम त्याग के धरातल पर खड़ा होता है।गरीबी नित्य परीक्षा लेती है अमीरी नही?जिस रोज अमीरी की परीक्षा होती है वह सहम सी जाती है,वह आत्मकेंद्रित व दिखावटी होती है,उसमे संघर्ष होता ही नही?और जहां संघर्ष नही होता वहां प्रेम कदापि नहीं होता है।गरीबी में प्रतीक्षा,त्याग व लज्जा होती है वहां जो प्रेम उत्पन्न होता है उसका सौंदर्य ही कुछ अलग होता है।हमारी फिल्मो अथवा साहित्य में प्रायः सौंदर्य इसीलिए गरीबी में ही दर्शाया जाता है।

फ़िल्म ब्रह्मचारी में राजेंद्रकृष्ण का यह एकमात्र गीत था जो अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था।इस फ़िल्म के नायक व नायिका की पृष्ठभूमि गरीबी से संबंध रखती है जो परोपकार को अपना लक्ष समझते है।जब नायक से नायिका प्रेम करने लग जाती है तो स्वाभाविक है यह उसके लिए अप्रत्याशित होता है तब वह खुशी से झूम उठता है और सारे जग को बताना चाहता है...
कोई प्यार हमें भी करता है,मोहब्बत के खुदा हम है...।सच मे जो परोपकारी है,उसका प्रेम साधारण हो ही नही हो सकता,वह वास्तव में प्रेम का परमात्मा है।

व्यक्ति से बड़ा विचार होता है।विचारो से व्यक्ति का व्यक्तित्व सजीव हो उठता है,भावना व्यक्तित्व को सौंदर्य से अभिमण्डित कर देती है तभी तो ये शब्द प्रेम में जन्म लेते है..

फूलों की ताजगी तू है,कलियों की नाजगी तू है
अब तेरी ज़िन्दगी में हूँ,ओर मेरी जिंदगी तू है
मोहब्बत के खुदा हम है....

भला अनुभूतियों की कोई माप होती है?वे तो बस होती है,उन्हें कहते चले तो कभी ठीक से नही कहा जा सकता,फिर भी इजहार करना करना होता है,प्रेम का मामला जो ठहरा और वह भी प्रेम के परमात्मा का?

आँखो से प्यार छलका के
हो देखा जो तूने शरमा के
पहलू में तेरे आ बैठे हम दो जहाँ ठुकराके
मोहब्बत के खुदा हम है..
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हृदय की भावना में सच्चा सौन्दर्य समाहित है,देह की सुंदरता में सौंदर्य खोजना बालू में तेल को तलाश करने जैसा है।सच्चा सौंदर्य उसकी संवेदनाओं, भावनाओ एवं विचारो में सन्निहित है।इन्ही में उसका आकर्षण है,प्रभाव ओर सौंदर्य है।और जब यह प्रभाव प्राप्ति कर लेता है तो मरुभूमि से ओएसिस फूटने लगता है..

होठों के जाम अपने है,ये सुबहो शाम अपने है
क्या फूल क्या तारे ये सब गुलाम अपने है
मोहब्बत के खुदा हम है...
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खुदा और वो भी मोहब्बत का ?भला यह सब उसके कैसे न हो ?चाहे होठों के जाम हो,सुबह शाम हो,फूल हो अथवा तारे हो सभी तो उसके गुलाम है।

राजेंद्रकृष्ण ने गरीबी को मोहब्बत का खुदा बताकर गरीबी को महिमा मंडित ही किया है।कुछ बुद्धिजीवियो की नज़र में यह गीत शायद कोई विशेषता न रखतां हो किन्तु मेरी दृष्टि में यह अद्वितीय है।

जाकी रही भावना जैसी प्रभू सूरत देखी तिन तैसी...!

मेरा उद्देश्य शंकरजयकिशन के प्रत्येक गीत को आध्यत्मिकता से जोड़ना है क्योकि यह समस्त शंकरजयकिशन के वो माणिक मोती है जो संगीत के मानसरोवर में अद्वितीय रूप में विद्यमान है जिन्हें परखने की जरूरत है।इस गीत में राजेंद्रकृष्ण ने प्रेम के परमात्मा की भावना को परिभाषित किया है।

प्रेम नदी की बहती धारा के समान है।जब यह पहाड़ से होकर गुजरती है तो अपने बहाव से चट्टानों में भी दरार डाल देती है।नदी और पहाड़ की दास्तान-ए-इश्क बहुत पुरानी है।जैसे पहाड़ नदी से प्रेम करता है,नदी भी उतनी ही शिद्दत से पहाड़ से प्रेम करती है।प्रेम कभी एकाकी ओर एकतरफा नही होता।एकांगी होती है--अधूरी इच्छाएं, जिन्हें प्रेम का नाम दे दिया जाता है।प्रेम तो एक पावन प्रवाह है,जहाँ से भी यह बहता है,वहां पावनता एवं शीतलता का स्पंदन ,स्पर्श एवं सौंदर्य के रंग उड़ेल देता है,मोहब्बत के खुदा में यही विशेषताऐ तो होती है।


Shyam Shanker Sharma
Jaipur,Rajasthan. 

Thursday, August 30, 2018

शंकर जयकिशन जी के सुरों में शैलेंद्रनामा : श्रद्धांजलि

 लेखिका 


Rekha Shenoy
रेखा शिनॉय

शैलेंद्र जी की ९५ वीं जन्मजयंति पर शंकर जयकिशन जी के सुरों में पिरोये उनके ९५ गीतों के मुखडों की अंताक्षरी कविराज शैलेंद्र जी को श्रद्धांजलि स्वरुप अर्पित...               

१)अजीब दास्तां है ये २)ये रात भीगी भीगी ये मस्त ३)तेरा मेरा प्यार अमर ४)रमैया वस्तावैया मैने दिल तुझको ५)कारे बदरा तू न जा न जा बैरी तू ६)तेरा जाना दिल के अरमानों का लुट जाना ७)नैन मिले चैन कहां दिल है वही तू ८)तू प्यार का सागर है तेरी एक बूंद ९)दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना रहा १०)होठों पे सच्चाई रहती है जहां दिल में ११)मेरा जूता है जापानी ये पतलून १२)नाचे अंग अंग अंग तेरे आगे १३)गुल मुस्कुरा उठा बुलबुल ये १४)ये चांद ये सितारे ये साथ तेरा मेरा १५)रुक जा ओ जानेवाली रुक जा १६)जहां मैं जाती हूं वही चले आते हो १७)हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना १८)नजर नजर से हो रही है बात प्यार की १९)किसीकी मुस्कुराहटों पे हो निसार २०)रुक जा रात ठहर जा रे चंदा २१)दिल अपना और प्रीत पराई किसने है ये २२)ये शाम की तनहाइयां ऐसे २३)सब कुछ सीखा हमने ना सीखी २४)खुली पलक में झूठा गुस्सा बंद पलक में २५)मेरे तुम्हारे बीच में अब तो ना परबत २६)तुम ही तुम हो मेरे जीवन में फूल ही फूल २७)लाल छडी मैदान खडी क्या खूब २८)बोल री कठपुतली डोरी कौन संग बांधी सच २९)चलत मुसाफिर मोह लिया रे पिंजडेवाली मुनिया ३०)याद ना जाये बीते दिनों की ३१)कहां जा रहा है तू ऐ जानेवाले अंधेरा है ३२)है सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द ३३)दम भर जो उधर मुंह फेरे ओ चंदा ३४)दिल की गिरह खोल दो चुप ३५)पतली कमर है तिरछी नजर ३६)रात और दिन दीया जले मेरे मन में फिर भी ३७)भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना भैया मेरे छोटी ३८)टीन कनस्तर पीट पीट कर गला ३९)लागे जब से नैन लागे हो दिल तो ४०)तुम्हे याद करते करते जायेगी रैन सारी तुम ४१)मतवाली नार ठुमक ठुमक चली ४२)लाखों तारे आसमान में एक ४३)केतकी गुलाब जूही ४४)हम काले है तो क्या हुआ ४५)आज कल में ढल गया दिन हुआ ४६)आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ४७)रुला कर चल दिये एक दिन हंसी बन कर जो ४८)जीना यहां मरना यहां ४९)हमने जफा ना सीखी उनको ५०)क्या मिल गया हाए क्या खो गया ५१)याssssहू चाहे कोई मुझे जंग कहे कहने दो ५२)दिल तेरा दीवाना है सनम ५३)मुझे कितना प्यार है तुमसे ५४)सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास ५५)सवेरेवाली गाडी से चले जायेंगे कुछ लेके ५६)किसीने अपना बना के मुझको मुस्कुराना ५७)नैया मेरी मझधार ५८)रुमझुम के बजाओ बांसुरी मुरारी ५९)राजा प्यारे मत करो प्यार ६०)रंगरंगीली पगिया बांधे आये ६१)ये बरखा बहार सौतनिया के ६२)कर गया रे कर गया मुझपे जादू ६३)दिल का ना करना ऐतबार कोई भूले से ६४)सुर ना सजे क्या गाऊं मै ६५)मनमोहना बडे झूठे हार के हार नही मानी ६६)नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी ६७)ठहर जरा ओ जानेवाले बाबू ६८)बागों में बहारों में इठलाता गाता ६९)तुम्हारे है तुमसे दया मांगते है ७०)हाए तू ही गया मोहे भूल रे ७१)रिक्शे पे मेरे तुम आ बैठे अब ७२)बोल मेरी तकदीर में क्या है मेरे हमसफर अब तो ७३)तेरी याद दिल से भुलाने चला हूं के खुद ७४)दिल ऐ दिल बहारों से मिल सितारों से ७५)सूरज जरा आ पास आ आज सपनों की ७६)क्या बताऊं मोहब्बत है क्या ७७)ये मेरा दीवानापन है या मोहब्बत ७८)तुम जो हमारे मीत ना होते गीत ७९)तुम तो दिल के तार छेड कर हो गये ८०)ये लूट खसूट ये डाकाजनी ८१)नैनो वाली तेरे नैना ८२)नाच रे मन बदकम्मा ठुमक ठुमक ८३)कल नही पाये जिया मोरे पिया ८४)ये मुंह और मसूर की दाल ८५)लाली लाली डोलीया में ८६)मेरे तुम्हारे बीच में अब तो ना परबत ८७)तुम्हारी भी जय जय हमारी भी जय जय ८८)ये तो कहो कौन हो तुम ८९)मुझे तुमसे कुछ भी ना चाहिये मुझे मेरे हाल पे ९०)प्यार हुआ इकरार हुआ है प्यार से फिर क्युं ९१)ये दुनिया बनाई है ९२)हमसे कोई प्यार करो जी ९३)जो मै जानती उनके लिये मेरे ९४)राजा की आयेगी बारात ९५)तूने हाए मेरे जख्म-ए-जिगर को छू लिया....इसी तरह शैलेंद्र जी के गीत हमारे दिल के तार छेड जाते है एवं दिल को छू जाते है.... भावपूर्ण श्रद्धासुमन...

Monday, August 27, 2018

महागायक महान मुकेश के दो और दुर्लभ गीत : पुण्य तिथि (27 अगस्त) पर विशेष



पुण्य तिथि (27 अगस्त) पर विशेष
Raajeev Shrivaastav

कोई कविता, गीत, ग़ज़ल और नज़्म महान गायक मुकेश के स्वर सौन्दर्य से सज कर किस प्रकार अमरत्व को प्राप्त हो जाया करता था उसे आज समझना भले ही कठिन हो पर उन दिनों भी जब मुकेश अपने जीवन काल में किसी गीत में अपने स्वर की संजीवनी उडेला करते थे तब भी उनकी इस सम्पूर्ण समर्पित साधना को समझना सरल नहीं था।
आज महान महागायक मुकेश की पुण्य तिथि है और आज के ही दिन मैं आप सभी संगीत रसिकों तथा मुकेश प्रेमियों के मध्य उनका संगीतबद्ध किया और उन्हीं के द्वारा गाया दो गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ। साथ ही मैं आज के इस पुण्य दिवस पर उस दृश्य-परिदृश्य की सम्पूर्ण कथा भी आपके समक्ष रख रहा हूँ जिस दिन दो पृथक-पृथक गीतों की स्वर रचना तथा उसका गायन महान मुकेश द्वारा किया गया था। अभी तक गायक मुकेश के जिन प्रदर्शित-अप्रदर्शित गीतों की सूचना हम सभी के मध्य उपलब्ध है, ये दो गीत उस उपलब्ध सूचना के अतिरिक्त हैं। अर्थात् मुकेश द्वारा गाए गीतों की कुल सँख्या में अब दो और गीतों की वृद्धि हो चुकी है। आइए, मैं उन दो दुर्लभ गीतों तथा उसकी रचना प्रक्रिया की सम्पूर्ण कथा आपको विस्तार से बताता हूँ।
महान महागायक मुकेश अपने निधन के एक या डेढ़ वर्ष पूर्व सम्भवतः वर्ष १९७५ में काशी नगरी में कार्यक्रम के लिए पधारे थे। प्राचीन काशी और वर्तमान के बनारस या वाराणसी नगर के ‘सिगरा स्टेडियम’ में महागायक मुकेश का संगीत कार्यक्रम था। इसके पूर्व भी गायक मुकेश बनारस में दो-तीन कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुके थे जिसमें ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ (बी.एच.यू.) परिसर में प्रस्तुत की गयी उनकी संगीत प्रस्तुति आज भी लोगों के स्मृति में जीवन्त है। वाराणसी के सिगरा क्षेत्र के इस कार्यक्रम में मुकेश की इस टीम में संगीतकार कल्याणजी-आनन्दजी, अभिनेता-उद्घोषक डेविड सहित कई अन्य सिने कलाकार भी उपस्थित थे। संध्या की बेला में बनारस के इस विशाल सिगरा स्टेडियम में सम्पूर्ण नगर और इसके आस-पास के समस्त लोगों का ऐसा जमावड़ा लग चुका था कि तिल रखने भर का स्थान भी वहाँ शेष नहीं रह गया था। विशाल मँच सज चुका था, सभी वादक अपने-अपने वाद्य यन्त्रों के साथ उसे व्यवस्थित करने में जुटे थे। दर्शकों और इन कलाकारों के मध्य एक पर्दा गिरा हुआ था जिसके उठने की ताक में उपस्थित अपार जन समूह व्यग्रता से महान मुकेश को देखने-सुनने को आतुर था। मुकेश मँच के पार्श्व में स्थित कक्ष में अपने हारमोनियम के साथ सोफे पर विराजमान थे। पूरी बाँह की रंगीन छापेदार कमीज़ पहने मुकेश मुख पर अपनी स्वाभाविक मुस्कान के संग अत्यन्त ही प्रसन्नचित्त लग रहे थे। तभी एक नवयुवक अपनी कविता की डायरी ले कर उनके पास आता है। मुकेश पहले तो उस दुबले-पतले युवक को ऊपर से नीचे तक देखते हैं और फिर उसकी कविताओं को पढ़ने लगते हैं। एक कविता पर उनकी आँखे टिक जाती है। उसके बाद वो दूसरी कविता पढ़ते हैं। इस बार मुकेश उस युवा को आश्चर्य से निहारते हैं। कविताएँ काव्य के व्याकरण और मात्रा के अनुरूप थी, मुकेश ने युवक से प्रश्न किया - ‘बेटा, तुमने संगीत सीखा हुआ है क्या?’, ‘जी नहीं, पर मैं तबला बजा लेता हूँ’ - युवक ने सकुचाते हुए उत्तर दिया। ‘आप मेरा भी ये गीत गा दीजिए’, युवक ने धीमे से कहा पर मुकेश कविता को पढ़ रहे थे और साथ में गुनगुना भी रहे थे। दुबारा जब युवक का आग्रह भरा स्वर उभरा तो मुकेश ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा - ‘बेटा, ऐसे कोई गीत थोड़े ही बनता है इसके लिए पूरी बैठक की जाती है, ढेरों बार धुन को बना कर और गा कर अभ्यास किया जाता है तब जाकर एक गीत गाने के लिए बन पड़ता है’। युवक के मुख पर अकस्मात् छा चुकी अवसाद की परत को भावुक मुकेश पढ़ चुके थे। कुछ बोले नहीं वो पर जब पुनः उस अध्यनरत युवा ने उनसे गीत गाने की विनती की तो मुकेश ने उसकी ओर अपनी प्यारी सी मुस्कान बिखरेते हुए कहा - गा दूँ !
मुकेश फिर से अपने हारमोनियम पर एक नहीं दो कविताओं को धुन में पिरोने में जुट गये। युवक को उन्होंने कहा, ‘तुम मेरे साथ मँच के निकट ही रहना जब मैं इसे गाऊँगा तो तुम्हें बुलाऊँगा’। कार्यक्रम प्रारम्भ होने का समय हो चुका था। अपार जनसमूह में अधिकांश सँख्या युवाओं की थी। पर्दा उठते ही जैसे ही मुकेश मँच पर आते हैं करतल ध्वनि के मध्य उपस्थित दर्शकों का अभिवादन करते हुए उन्होंने ‘होठों पे सच्चाई रहती है जहाँ दिल में सफ़ाई रहती है, हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गँगा बहती है’ गीत जैसे ही गाना प्रारम्भ किया लोगों के आह्लाद और हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। गँगा की नगरी में गँगा किनारे के वासियों के मध्य मुकेश के ही स्वर में गँगा की महिमा सुन कर काशी वासी गदगद हो चुके थे। काशी वासियों को मुकेश के मुख से उनके इस प्रथम गीत में ही गँगा का गौरवान्वित करने वाला यह गीत सुन कर मस्त कर दिया था। बच्चों और युवाओं की टोली तो उठ कर नाचने लगी। जिस प्रकार बनारस के लोग मुकेश के इस प्रथम गीत से अभिभूत थे उसी प्रकार महागायक मुकेश भी बनारसियों के इस उत्साह और उल्लास को देख कर अचरज से भर उठे थे। दूसरा गीत मुकेश ने फ़िल्म ‘छलिया’ से ‘डम डम डिगा डिगा मौसम भीगा भीगा, बिन पिये मैं तो गिरा, हाय अल्लाह, सूरत आपकी सुभान अल्लाह’ गाया। अब तक जो लोग स्वयं को रोके हुए थे वो भी मचल उठे। स्टेडियम का वातावरण किसी उत्सव सा हो चुका था। जो लोग मुकेश से उनके दर्द भरे गीतों के माध्यम से परिचित थे उनकी आँखे इस उल्लास भरे दृश्य को देख फटी की फटी रह गयी। प्रसिद्ध अभिनेता डेविड जो इस कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे, मँच के पार्श्व से यह सब दृश्य देख कर आयोजकों से कहने लगे कि आज मुकेश साहब अपने पूरे रंग में हैं पर यहाँ के दर्शक तो उनसे भी दूने उत्साह में हैं। मैंने ढेरों कलाकारों के कार्यक्रम संचालित किए हैं पर ऐसा दीवानपन तो मैंने रफ़ी और किशोर के शोज़ में भी नहीं देखा।
विस्मय की इस अद्भुत बेला में वो युवा भी था जो यह आस लगाये प्रतिक्षारत था कि जाने किस घड़ी मुकेश उसकी कविता को स्वर देंगे। उपस्थित विशाल दर्शकों के उल्लास और उत्साह को देख कर और उस पर महान मुकेश की प्रसन्नता से वह यह भी सोच रहा था कि मुकेश जी ऐसे में उसकी कविता को वाणी देने का साहस दिखा पायेंगे ? ऐसा न हो कि दर्शक उसकी अनजान और साधारण सी कविता को पसन्द ही न करें। ‘डम डम डिगा डिगा’ के बाद अब तीसरे गीत को गाने के लिए मुकेश अपनी डायरी पलट रहे थे। ‘भाइयों और बहनों, मैं अब आपको जो गीत सुनाने जा रहा हूँ वो आपके ही इस बनारस के युवा कवि का है, मैंने अभी यहीं पर इसकी धुन बनायी है’। मुकेश की इस उद्घोषणा से काशीवासी एक बार फिर से अचम्भे में थे। सभी हतप्रभ थे कि मुकेश जैसा महान गायक बनारस के किसी नये कवि का गीत गाने जा रहे हैं। स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था कि अभी तक जो दर्शकगण मुकेश की गायकी के वशीभूत थे पर वे अब उनकी इस उदारता के प्रति श्रद्धा भाव से नतमस्तक थे। मँच पर मुकेश वादकों के पास जा कर उन्हें गाये जाने वाले गीत की धुन और उसका मीटर बता कर पुनः दर्शकों से बात करते हुए कहना प्रारम्भ करते हैं - ‘ये हैं अत्रि भारद्वाज, आपके ही बीच के हैं, इन्हीं का लिखा गीत मैं अब आपको सुनाने जा रहा हूँ’। मुकेश अपनी अँगूलियों को अपने हारमोनियम पर फेरते हैं और वादकगण अपने-अपने वाद्यों पर संगत को चैतन्य हो जाते हैं - ‘इक दिन दुनिया मिट जानी है, मोह न कर इन्सान, कैसा अपना कैसा पराया कौन करे पहचान’, गीत जैसे ही मुकेश की वाणी में उभरता है, सभी शान्त चित्त हो कर गीत सुनने लगते हैं। अभी जहाँ सभी लोग उल्लास में डूबे थे वहीं अब सभी भाव विभोर हो कर इस सर्वथा नूतन गीत को सुनने में मग्न हो गए। गीत पूरा कर मुकेश ने अपनी प्रकृति के अनुरूप जैसे ही अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाया वैसे ही करतल ध्वनि से अपार जन समूह ने उनका आभार व्यक्त किया। मुकेश स्वयं प्रसन्न थे कि लोगों ने उनके इस नये गीत और उसके संगीत को सराहा। मुकेश ने जब लोगों का सकारात्मक भाव और भारी उत्साह देखा तो उन्होंने तत्काल फिर से उद्घोषणा की - ‘लीजिए, अब मैं आपको अत्रि भारद्वाज का लिखा एक और गीत गा कर सुनाता हूँ’ और मुकेश अपने भावपूर्ण स्वर में गीत प्रारम्भ कर देते हैं - ‘असीम प्यार छलक आया था आँसू बन कर, ऐसा महसूस किया है तुम्हें विदा करते’। काशी वासी अचम्भित थे कि जो मुकेश झूम कर अभी कुछ समय पूर्व ‘डम डम डिगा डिगा’ गा रहे थे वही अब निमग्न हो कर यह भावपूर्ण गीत गा रहे हैं। दर्शकों में विशेष कर युवाओं में गायक मुकेश की इस विविधतापूर्ण गायकी से जो अपूर्व उत्साह दिख रहा था वह तब उनकी अपार लोकप्रियता का अद्भुत मापदण्ड था। बनारस वासियों के सम्बन्ध में सदा से यह बात प्रसिद्ध रही है कि यदि उन्हें कोई हृदय से भा गया तो वे उसे सर आँखों में बिठाने में तनिक भी विलम्ब नहीं करते और यदि उन्हें किसी की प्रस्तुति पसन्द नहीं आयी तो उसे नयन से नीर की तरह गिराने में भी देरी नहीं करते। इसके बाद तो ‘रूक जा ओ जाने वाली’, ‘मेरे मन की गँगा और तेरे मन की यमुना का’, ‘सावन का महीना’, ‘जाने कहाँ गये वो दिन’ जैसे गीतों की झड़ी लग गयी।
अत्रि भारद्वाज की प्रसन्नता का ठिकाना ही नहीं था। उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि महान गायक मुकेश उनके एक नहीं दो गीत गायेंगे। उनके लिए यह एक अविस्मरणीय क्षण था। कार्यक्रम की देर रात समाप्ति के पश्चात् जब गायक मुकेश का आभार व्यक्त करने अत्रि उनके पास पहुँचे तब महान मुकेश ने आनन्दजी भाई को अपने पास बुलाया और उनसे कहा कि ये बहुत अच्छा लिखते हैं, इन्हें अपने यहाँ बुलाइये। वहीं खड़े कल्याणजी भाई ने अत्रि को बम्बई (मुम्बई) आने का आमन्त्रण उसी समय दे दिया। युवा अत्रि ने उनसे प्रश्न किया - ‘क्या यहाँ बनारस में रह कर गीत नहीं लिखा जा सकता?’ आनन्दजी भाई ने उत्तर दिया - नहीं, आपको तबेले में तो आना पड़ेगा। जहाँ जो काम होता है उस नगरी में तो कम से कम छः महीने तो रहना ही पड़ेगा तभी बात बन सकती है’। पर अत्रि भारद्वाज तब इस प्रस्ताव की महत्ता और इसकी गम्भीरता को नहीं समझ सके थे जिस कारण वे अपनी पढ़ाई और पत्रकारिता में ही आगे के समय में रमे रहे।
गायक मुकेश एक महान गायक तो थे ही साथ में वे विलक्षण प्रतिभा के धनी अत्यन्त ही प्यारे इन्सान भी थे। किसी सर्वथा नये गीत को यूँ ही आनन-फानन में वो ही व्यक्ति संगीतबद्ध कर सकता है जो अद्भुत गुणों से युक्त कविता और संगीत की सूक्ष्मता एवं गूढ़ता को भली-भाँति समझता-बूझता हो। यह घटना और इस जैसी ढेरों अनेक घटनाएँ गायक मुकेश को एक गायक के अतिरिक्त एक सम्वेदनशील संगीतकार के रूप में भी स्थापित करती है। इसके पूर्व वे ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्ताँ हमारा’ रचने वाले इक़बाल की एक भावपूर्ण नज़्म ‘कब हँसा था जो कहते हो की रोना होगा, हो रहेगा जो मेरी क़िस्मत में होना होगा’ को अपने ही स्वर और संगीत में विदेश की धरती के एक मँच पर प्रस्तुत कर सभी को अचम्भित कर चुके थे। मुकेश के सभी समकालीन और बाद के किसी गायक-गायिका से क्या आप तत्क्षण किसी गीत की धुन बना कर उसे मँच पर सहज प्रस्तुत कर देने के सम्बन्ध में कल्पना कर सकते हैं ? इसीलिए भारत के प्रथम वैश्विक गायक महान मुकेश महागायक कहे जाते हैं। 
भाई अत्रि भारद्वाज से मेरा परिचय लगभग तीन दशक पुराना है। उन दिनों में मैं भी ‘आज’, ‘गाण्डीव’ जैसे बनारस के प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में लिखता था और अत्रि भाई से मिलना-जुलना भी होता था पर उनकी इस विशिष्ट उपलब्धि के सम्बन्ध में उन्होंने मुझे विस्तार से अभी कुछ माह पूर्व ही बताया था। मेरे आग्रह पर अत्रि भाई ने ‘आज’ के १६ सितम्बर १९७६ के विशेषांक में प्रकाशित अपने संस्मरण-आलेख की प्रति मुझे आज ही उपलब्ध करायी जिसमें गायक मुकेश के निधन के पश्चात् विशेष श्रद्धांजलि दी गयी थी। इसी पत्र में वह चित्र भी प्रकाशित हुआ था जिसमें वे मँच पर गायक मुकेश के संग उपस्थित थे। इसी विशेष अंक में तब गायक मुकेश को श्रद्धांजलि देते हुए वर्तमान के सुप्रसिद्ध लेखक-समालोचक नामवर सिंह की एक कविता ‘वह प्यारा प्यारा इन्सान’ भी प्रकाशित हुयी थी।
आज महान महागायक मुकेश की ४२वीं पुण्य तिथि के अवसर पर अत्रि भारद्वाज द्वारा लिखी दो कविताओं के साथ गायक मुकेश द्वारा संगीतबद्ध और गाये गीतों की सूची में दो और गीत सम्मिलित हो चुके हैं। इस हेतु आज मैं अत्रि भाई का आभार व्यक्त करता हूँ तथा उन्हें बधाईप्रस्तुत करता हूँ जो उनके लिखे दो गीतों को महान गायक मुकेश ने गा कर उसे सदा के लिए अमर कर दिया है।
महान महागायक मुकेश को नमन !
डॉ राजीव श्रीवास्तव 
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इक दिन दुनिया मिट जानी है
मोह न कर इन्सान 
कैसा अपना कैसा पराया 
कौन करे पहचान 
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काम न आयेगी धन दौलत 
न मोटर बंगला न बाड़ी 
प्रेम है वह अनमोल ख़ज़ाना 
चलती जिससे जीवन गाड़ी 
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प्रेम बिना जीवन सबका 
हो जाता है वीरान 
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तेरा ख़ज़ाना तेरे घट में 
फिर काहे तू दर दर भटके 
मोह काम नफ़रत के दवारे 
क्यों जा कर सिर अपना पटके 
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प्रेम की दौलत ख़त्म न होगी 
दिल खोल के कर दान 
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बुरा कभी न किसी का सोचो 
हर राही को तुम अपना लो 
प्यार से मिलना सबके गले तुम 
सुख देकर दुःख को अपना लो 
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मान को तो सम्मान मिला है 
अपमान को अपमान 
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[गायक एवं संगीतकार: मुकेश, गीतकार: अत्रि भारद्वाज (अप्रदर्शित)] 
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असीम प्यार छलक आया था 
आँसू बन कर 
ऐसा महसूस किया है 
तुम्हें विदा करके 
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हज़ार बार तुमने ख़्वाबों में देखा होगा 
दो टूक बात अपने हमसफ़र से की होगी 
अब जा रहे हो प्रेम के बन्धन में बँधने 
दिल की धड़कन और तेज हो गयी होगी 
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ऐसा महसूस किया है 
तुम्हें विदा करके
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कल का सपना सँवारती थी तुम्हारी आँखें 
हर एक पल बेक़रारी बढ़ती जाती थी 
थामना भी मुनासिब न था दिल कि धड़कन को 
मिलन की आग जिस्म में भड़कती जाती थी 
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ऐसा महसूस किया है 
तुम्हें विदा करके
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[गायक एवं संगीतकार: मुकेश, गीतकार: अत्रि भारद्वाज (अप्रदर्शित)] 
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वह प्यारा प्यारा इन्सान 
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बच्चे जैसी थी मुस्कान, 
चेहरा क्या था प्यार की खान। 
वक़्त बता दे कहाँ खो गया, 
वह प्यारा प्यारा इन्सान।
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सदा बिहँसता रहता था, 
गोरा गोरा उसका दिल था। 
सबसे रोज प्यार से मिलना,
उसकी आदत में शामिल था। 
उसके चलने में थी तान। 
वक़्त बता दे कहाँ खो गया, 
वह प्यारा प्यारा इन्सान ?
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चमक दमक के बीच में रह कर, 
सही रोशनी जान गया था। 
प्यार का सिक्का सच्चा सिक्का, 
इसको वह पहचान गया था। 
उसका दुश्मन था अभिमान। 
वक़्त बता दे कहाँ खो गया, 
वह प्यारा प्यारा इन्सान ?
.
गायक था वह बड़ा सुरीला, 
सबसे पहले था इन्सान।
धरती पर कुछ ऐसा चेहरा, 
बार बार भेजे भगवान। 
गीतों को भी आ जाता है, 
बार बार उसका ही ध्यान। 
वक़्त बता दे कहाँ खो गया, 
वह प्यारा प्यारा इन्सान ?
.
नामवर 
[प्रस्तुत कविता सुप्रसिद्ध लेखक, कवि एवं आलोचक डॉ नामवर सिंह ने महान गायक मुकेश के निधन पर श्रद्धांजलि के रूप में लिखी थी जो वाराणसी से प्रकाशित ‘आज’ समाचार पत्र के विशेषांक में दिनाँक १६ सितम्बर १९७६ को प्रकाशित हुआ था]

Monday, March 13, 2017

Who Were Shanker-Jaikishen ?



1)Shankar Jaikishan music, synonym of Indian Film music, has far reaching impact in India and outside. The cartier replica bracelet duo moulded music and musical mood of masses since 1949, and are still considered to be the best music composers from India.
The duo also contributed outside movie industry with their much celebrated albumRaga in Jazz Style, and background music for documentary Everest expeditionamong many others. If we look at the popular impact by any personalities in the Rolex Replica Watches field of music during the post independence period in India, the obvious choice is Shankar Jaikishan.

2)Shankar, the more versatile of the two, was a prolific musician with mastery over dozens of instruments, Indian classical music and dance forms. He was primarily responsible for building Shankar Jaikishan team with dedicated lyricists, music assistants, and jumbo-sized 60-pieces orchestra, and was the lead composer. On the other hand, Jaikishan was incredibly creative and legendary composer himself. He was genius of background music and romantic tunes though he too could compose songs in other genres.
During initial years, all decisions about musical engagements were made by Shankar; but both started taking up assignments cheap iwc replica separately in the late sixties.
They had sharp contrasts in personalities and physical appearances. Shankar was gym-savvy, non-drinker, and was a strict disciplinarian. On the other hand, Jaikishan was party-man and was very social. In fact, Jaikishan was mostly the point of contact for producers, directors and actors to incorporate their requests due to his friendly nature. Of course, both were great human beings, and were incredibly simple in spite of fame and richness.

3)Shankar was entirely dedicated for musical innovations during his whole life; it was his diwanapan. He created diverse tunes and musical edifices beyond human imagination during his career spanning from 1949 to 1987.
Shankar's music has a zing that makes the listener shiver with divine thrill. His music is mostly filled with strange patterns and is difficult to copy without being identified. Some example tunes ascribed to Shankar are Awara Hoon, Yahoo! Koi Mujhe Junglee Kahe, Tera Jana, etc.
Shankar used to give importance to all aspects of a song - its tune, prelude, interludes and entire orchestra Breitling Replica Watches accompanying the song. He used to emphasise on the deployment of particular instruments and the way it is done.
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Shankar's day used to start early in the morning and to continue until midnight. He is known to create tunes for a song instantly and is regarded as the fastest composer until today.

4)Jaikishan can safely termed as the best ever composer of romantic tunes. His ability of composing background music is breitling replica uk considered unparallel even by his contemporaries.
The example tunes ascribed to Jaikishan are Teri Pyari Pyari Soorat Ko (album:Sasural), Bedardi Balma Tujhko (album: Arzoo), Yeh mera prem patra (album:Sangam), etc.
He gives major emphasis to tunes in thewhole composition. He understood the taste of masses and struck right chord.
Jaikishan was very social and used to spend his major off-time withfriends andBreitling Replica Watches partying. However, he was very particular when it comes to work and sticking to timelines of assignments.
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5)Shankar was basically from Punjab, but his initial years were spent in Hyderabad. His full name was Shankarsingh Raghuwanshi, and he was an accomplished tabla player and dancer when he came to Mumbai. Later he assisted Husnlal Bhagatram for composing music, and took up music and stage performance assignments at Prithivi theatre. His proficiency in music and dedication was highly appreciated by his pears and seniors alike.
Jaikishan,Cheap Breitling Replica whose full name was Jaikishan Dayabhai Panchal, was from a royal musician’s family of Gujurat. He was initially trained in classical music by his mother. He achieved proficiency in playing harmonium. Later he came to Mumbai, and pursued his musical interests apart from working in a factory to meet his basic needs.

6)Shankar and Jaikishan first met when both were waiting for a director outside his office seeking some musical assignment. They developed an instant bond due to similar musical interests and ambitions.
In their meeting Shankar disclosed about a requirement of harmonium player at Prithivi theatre. Jaikishan expressed his interest, and Shankar recommended his name back at Theatre. Both then became colleagues, and collaborated for music assignments at Prithivi theatre.
When showman Raj Kapoor, eldest son of Prithviraj Kapoor (owner of Prithvi Theatre), made his first movie Aag, Shankar Jaikishan assisted Ram Ganguly, who was heading the music division of Theatre and was the obvious choice as music composer of the film.
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7)While assisting Ram Ganguly in music compositions, Shankar was ambitious. He had managed to show his ability in composing music independently to Raj Kapoor. Meanwhile, the showman was looking for a new creative team for his upcoming film "Barsat", and proposed to Shankar to become its music composer. It was a great opportunity, and Shankar and Jaikishan wanted to go together for the assignment.
The music of Barsaat was a rage across India. The music was fresh accompanied by melodious tunes; and broke all barriers of music compositions for a movie. Their favourite lyricists Hasrat Jaipuri and Shailendra got associated with them from the first assignment. They used the then struggling singer Lata Mangeshkar for eight songs in Barsat, a surprise to everybody, and also for different characters in the film, another surprise!
The Shankar Jaikishan duo had formed cheap iwc replica .

8)Riding over huge success in their first movie, Shankar Jaikishan needed more assignments to prove that Cheap Breitling Replica they were not just one-time phenomenon. They started taking assignments apart from those from Fake Cartier. Their albums of Awara, Nagina and Poonam among others established them as the leading composers-duo.
Later, music scores of Awara and Shree 420 among others became very popular abroad. Shankar Jaikishan magic spread across globe.
9) With each movie Shankar Jaikishan brought an ever fresh blend to contemporary music. They concentrated in building unique orchestra form through great exploitation of Indian, oriental and western music, and with marathon practice hours with Cheap Rolex Replica dedicated musicians. Shankar-jaikishani Orchestra was born with Sebastian De'Souza in charge there of. Rhyme section was being looked after by Dattaram, an independent and successful music composer himself. The stage was now set for a big showdown in music scene.
Shankar Jaikishan went on creating albums like New Delhi, Chori Chori, Basant Bahar, Dil Apna Aur Preet Paraye, Yahudi and Anari among others. With the sheer versatility of tunes, accompanying orchestra and perfection in subtle musical orientation, Shankar Jaikishan established their supremacy. Indian music started being identified with film music in general, and with Shankar Jaikishan music in particular.
10) 
Early sixties saw Jaikishan contributing almost equal number of scores as Shankar. Both released batteries of scores and surpassed all musical norms.
Shankar-jaikishani orchestra started increasing to a jumbo size, and varieties of movies provided suitable platform to unleash their creativity to cartier replica bracelet its climax. Their music studio became a sacred place for all musicians and young composers.
11) Shankar Jaikishan started taking more assignments, but the quality remained intact. The series of albums with fast dance scores and slow romantic melodies became saleable pattern and success-movie-formula.
Shankar Jaikishan became highest paid music directors of their time. Movies attracted people to movie halls due to a mere mention of Shankar Jaikishan as its music directors
12) 
With increasing work pressure, Shankar and Jaikishan started giving music independently. Lyricist Shailendra (for the next few years until his untimely death) mostly worked with Shankar and lyricist Hasrat Jaipuri with Jaikishan.
Jaikishan was then a married man and started composing music from his home whereas Shankar was working from their music studio. However, there was give-and-take in a great way, and collaboration continued.
13)

With achievement of incredible fame and signing for numerous movies (see cheap iwc replica towards late sixties), the music quality deteriorated with respect to their own standard. Non-musical phenomenon entered into their musical pursuit. To add, a series of their movies crashed at box-office. Movie producers started associating with other composers as they were charging much lesser fees and could strike an acceptance among popular masses. This saw the beginning of decline of Shankar Jaikishan brand and triggered the end of Golden Era of Hindi film music. In fact, some young composers like Kalyanji-Anandji, Laxmikant Pyarelal, and R D Burman had started getting popular attention and approval with their music being moulded in the line of Shankar Jaikishan music.
With Shankar and Jaikishan working separately, critics found it an opportunity to create an atmosphere of mistrust as both had then become the primary media attention and were susceptible then. Some of their sycophants and wrong friends started playing spoil-sport. Moreover, Shankar and Jaikishan started signing a large number of movies beyond their capacity, and made ways for their decline. However, they could hold their fort intact as the top music directors until Jaikishan's death and desertion of their native R. K. Films banner.
14) Jaikishan fell ill and died in the year 1971. In late sixties, Jaikishan was producing more number of popular scores compared to his senior counterpart, and was ahead in the Breitling Replica Watches popularity chart during that time.

With Jaikishan's untimely death, the Shankar Jaikishan brand received the fatal blow, and was not the same again.
15)
Shankar kept the brand name intact by Breitling Replicaretaining the name Shankar Jaikishan even after Jaikishan's death. But situation was quite different for genius Shankar then. The year 1971 saw release of maximum number of albums by Shankar Jaikishan that were mostly done Cheap Breitling Replica by Jaikishan. But majority of them crashed at box-office, and Shankar were in terrible pressure professionally too after loosing Jaikishan.

Shankar started completing the unfinished albums signed by Jaikishan and himself. After failed albums in 1971, Shankar was not given the 60-piece orchestra for their new albums by producers citing cost reasons. The quality of music was affected in the process. Shankar too could not reconcile with the changed scenario, and many top banners including R. K. Films distanced themselves from him due to past box-office failures.
Shankar was in dilemma.
16) In spite of all odds, Shankar continued his music pursuit single-handedly and produced some highly popular albums like Beimaan (the last film awarded by Filmfare to Shankar Jaikishan), Naina, Lal Pathar, Seema (new), Vachan, and Do Jhoot among others. By then, commercial viability of Shankar Jaikishan brand was almost at stake, and Shankar's most trusted leiutants were about to leave for greener pasture. Shankar undertook creating album of Sanyasi as entrusted by producer and director Sohanlal Kunwar.
For all technical reasons, Sanyasi remains the last major album of Shankar Jaikishan. Its scores were so popular that everybody believed that Shankar Jaikishan brand was again going to dominate Bollywood. But it did not happen - reasons were, of course, non-musical - Shankar (Jaikishan) already had their time.
17) Even after Sanyasi, Shankar continued providing music for movies though he also associated himself with TV programs in early eighties. These years also saw some novel scores being created. Notable albums during this era are Atmaram, Garam Khoon, Chorni, and Eent Ka Jawab Patther among others. But Shankar Jaikishan brand had already gone into oblivion.
18) Shankar died in the night of April 26, 1987 due to a massive heart attack as known from his family source. The world came to know about his death a day after the cremation was over.

As their public tributes, the showman Raj Kapoor attributed the musical success of his movies to Shankar Jaikishan, and singer Lata Mangeshkar termed him as the best of the best composers. But Shankar was no more.
19) Shankar Jaikishan music has a distinct character. People easily recognise a score to be of Shankar Jaikishan if it is melodious accompanied by soothing but high octave orchestra. Their music varies from fast-paced ones to very slow ones, but each one blends with orchestra well and creates an immediate bond with music lovers.
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20) It is always very surprising to know that Shankar Jaikishan experimented with 90-plus singers and 60-plus lyricists. Inspite of successful music albums with particular singers or lyricists, they used to use different people every time successfully. For example, they had successfully experimented with Manna Dey in Chori Chori and with Mukesh in Yahudi. They also used to bring newcomers and could produce amazing results like Lata Mangeshkar in Barsaat, C. H. Atma in Nagina, Subir Senin Kathputli, Sharda in Suraj, and Vishweshwar Sharma in Sanyasi among others.

21) When asked, Shankar had once told that their learning started with Indian classical music, and they went ahead for other clans of music later. However, the ease of use of both Indian classical and western music, and the depth of exploitation of both to create the Shankar Jaikishani flavour is magnificent and incredible. In fact, Shankar Jaikishan were the first to successfully experiment and blend Western, Arabian, and Latin American music into Indian musical sects.
They also had a rare ability to visualize the movie picturisation to cast the playback music into appropriate mould and frequency. Jaikishan had an unparallel acumen in background music with his best scores being Sangam and Mera Naam Joker; and he was primarily responsible for background scores of Shankar Jaikishan movies till his death. Shankar was also no less in producing background music and his notable score is Sanyasi. Both used to take just three days to complete the background score of a movie.
22)
Shankar Jaikishan gave birth to distinct persona for each actor in their movies. They created a chaplin-like tramp image for Raj Kapoor, panerai replica aggresive romantic image for Shammi Kapoor, and gentle and around-the-tree persona for Rajendra Kumar among others. The movies of respective actors carried music appropriate to their screen Wholesale led light bulbs persona invariably.
23) When Shankar and Jaikishan started as a team, it was a strategic decision that changed the musical history of India later. Though nobody knows the reason of going together for such an assignment as it is first-time ever in India, they perhaps understood the level of quality and effort required to convert a film into a master musical piece. They were aware of contemporary process of music compositions and settings, and wanted to bring a radical change to it. They were later successful in this and went on being the greatest.
The duo started building an enviable team of large number of musicians, two proficient lyricists like Shailendra and Hasrat Jaipuri, a rhyme assistant like Dattaram, an orchestra arranger like Sebastian De'Souza. These people were great in their own faculty and knew their jobs well and exactly. However, credit of entire team management and consequent success goes mostly to Shankar Jaikishan as these team members could not create the same magic with other composers when they worked outside. It is always a point of discussion about how they could bring out such perfect scores with such a huge team when they themselves and most of their musicians had not gone through systematic study of western music schools.

Shankar Jaikishan team can be compared to any professional corporate house. Their deliveries were in time and to the perfection. Team members were also paid well.
24) Shankar Jaikishan exploited and extended musical horizon in the twentieth century, and gave young Indian Republic an expression and an identity in the field of music. They became source of inspiration to almost all young composers from sixties until today. Metamorphic forms of their scores are being represented by other composers throughout the world - title song of Hollywood blockbuster Ghost World in the year 1993, a popular album in UK, and background score of a movie by legendary movie director Satyajit Ray are the notable ones among many others. The leading Indian composers-duo in seventies, Laxmikant-Pyarelal, had set the goal of being another Shankar Jaikishan throughtout their career. The album Teesri Manzil by the music composer R D Burman, cast exactly in Shankar Jaikishani mould, is still considered to be his best; in fact, he had earned direct compliments from Jaikishan for those scores.

25) Today, Shankar Jaikishan music is popular in India and abroad due to its sheer quality. However, many of their albums are not being made available by the copyright owners. Unfortunately, many of their scores are being re-packaged in the name of actors or singers without the mention of the music composers. This commercial piracy must end, and there should be genuine and consistent effort from everybody involved to keep the treasure intact and available for music lovers.
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Sunday, January 1, 2017

कर्मयोगी संगीतकार शंकर( जयकिशन )



हिंदी फ़िल्मी उद्योग मे मूर्खो की असीम संख्या है,चाहे फिर वो अभिनेता हो,अभिनेत्री हो,निर्माता,निर्देशक,गीतकार,संगीतकार ,फ़िल्मी लेखक हो आदि आदि।इसमे भी तुर्रा यह है कि फ़िल्मी समीक्षक अपने को सर्वोपरी मानते है?फिल्मो की जो समीक्षा भी यही करते है।इन समीक्षकों को यह गलतफहमी है कि वह यह मान बैठे है कि उनकी समीक्षा से ही तय होता है कि फिल्म चलेगी अथवा नहीं?
और अपने इस हुनर का जम कर वो फायदा उठाते है जिससे उनका नाम भी बढ़ता है,दाम भी मिलते है और फ़िल्मी पार्टियों के निमंत्रण।सर्वत्र मौज ही मौज?
इसी से पीत पत्रकारिता का जन्म होता है जिसमे सच्चाई कम और मिर्च मसाले दार समाचार होते है जिसे अल्प बुद्धि वाला पाठक सत्य मान बैठता है।
हिंदुस्तान के फ़िल्मी इतिहास में संगीत के मामले में सबसे अधिक पन्ने शंकर जयकिशन से भरे पड़े है।न जाने कितने संगीतकार आये गए पता ही नहीं किन्तु हमारे फ़िल्मी पंडितों ने अपनी समस्त ताकत इन दोनों संगीतकारो पर लगा दी।इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि इस जोड़ी ने एक नए संगीत की परम्परा डाली जो रातों रात पुरे मुल्क ही क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गयी,तो उन्होंने इन्ही पर अपना निशाना साधा,प्रसिद्ध व्यक्ति के समर्थन अथवा खिलाफ होने पर ही आपकी कलम की प्रशंसा होती है?और इसी का परिणाम है कि जयकिशन जी के 1971 में हुए निधन और शंकर जी के 1987 में निधन होने के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ा जा रहा।जयकिशन तो मात्र 42 वर्ष की आयु में ही इस संसार को छोड़ गए इसका नकारात्मक असर यह पड़ा की इनके संगीत की हर असफलता को शंकर जी से जोड़ दिया गया।
ऐसा लिखने लगे की मानों 1971 तक का संगीत मात्र जयकिशन ने दिया और 1971 के बाद का शंकर जी ने।1971 के बाद का संगीत निसंदेह शंकर जी ने दिया किन्तु उससे पहले क्या शंकर जी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते थे? 
शंकर जी की जगह कोई और होता तो शायद परास्त हो जाता,शंकर जी का अपना कोई रक्त संबंधी नहीं था,संगीत में ही वह अपना समस्त सुख खोजते थे,उसी में रमे रहते थे,अकूत सम्पदा के वो अकेले स्वामी थे,उन्हें न कोई रोग था न कोई आर्थिक संकट यही कारण था कि उन्होंने अपनी अंतिम फिल्म गौरी का संगीत मात्र एक रूपये में दिया,आपको विस्मय होगा गोरी फिल्म को बनाने वाला और कोई नहीं अपितु उनकी कार को साफ़ करने वाला कर्मचारी था नाम था सुधाकर शर्मा।
शंकर जी में दो गुण मुख्य थे स्वाभिमान से जीना और दूसरा संगीत!
उनके सभी मित्र हिंदी फिल्म उद्योग की नामचीन हस्तियां थी जो कभी इनके पास मंडराया करती थी किन्तु जब समय विपरीत हुआ तो सभी एक एक करके दूर होते चले गए।उन्हें कोई कष्ट नहीं था बस कष्ट था यही की जिन्हें वो मित्र समझते थे वो सभी बेवफा निकले जिसमे सबसे शीर्ष पर स्थान है राजकपूर का जिन्हें शंकर जी के बिना रोटी ही नाही भाती थी।
राजकपूर के अलावा लता मंगेशकर,मुकेश ने भी उन्हें बरबाद करने में कोई कौर कसर नहीं छोड़ी।
स्मरण रहे जयकिशन ,मुकेश,राजकपूर और लता की स्थापना का श्रेय शंकर जी को ही जाता है, किन्तु जयकिशन जी के निधन के बाद सभी किनारा कर गए..शंकरजी ने अपने रेडियो के एक कार्यक्रम में कहा था जो रिकार्ड में है..
रहते थे कभी जिनके दिल में हम जान से भी प्यारो की तरह
बैठे है उन्ही के कूँचे में हम आज गुनहगारों की तराह!!
यह भी कहा जाता है कि शारदा के कारण शंकर जी मूल धारा से दूर होते चले गए।क्या किसी नवीन गायिका को अवसर देना भूल है और यहाँ यह उल्लेख भी कर दूँ की राजकपूर ने शारदा को शंकर जयकिशन के पास कुछ सीखने को भेजा था!गर शंकर जी ने शारदा की प्रतिभा को निखारा तो इसमे क्या गलत है।और शारदा को उन्होंने प्रथम फिल्म सूरज में जब परवान चढ़ा दिया तो लोग घबरा गए और यही से शंकरजी के विरुद्ध एक मोर्चा खोल दिया गया,जिसकी कीमत उन्हें कदम कदम पर चुकानी पड़ी।विरोधियो को लगा की जो शारदा को रातों रात हिट कर सकता है उसके पास न जाने कितना सृजन होगा।
बस उनके संगीत की हत्या का सिलसिला यही से आरम्भ हुआ।हलाकि फिल्म अनाडी और चोरी चोरी के वक़्त ही उनके विरुद्ध संकेत मिलने लग गए थे पर उस वक़्त उनकी हिम्मत उनके विरुद्ध जाने की नहीं हुई ,फिर भी शंकर जी पर सोहन लाल कँवर,कनक मिश्रा, राजेंद्र भाटिया और पाँछि आदि उनके बुरे वक़्त में सबसे अच्छे मित्र साबित हुये।
शंकर जी ने अंतिम समय तक घुटने नहीं टेके।जिसने कठनाइयों के आगे घुटने टेक दिए,जिसने अपनी हार मान ली,वह आगे कैसे बढ़ सकता है?शंकर जी ने कभी भी हार नहीं मानी वो जानते थे आगे वही बढ़ सकता है जो कभी हार नहीं मानता,चाहे कैसे ही परिस्थति क्यू न हो वो अपनी दृष्टि लक्ष्य पर रखता है।
उनका सिर्फ एक ही लक्ष था अपने छोटे भाई जयकिशन जी का नाम उनके साथ मरते दम तक जुड़ा रहे।उनकी यह इच्छा उन्होंने पूर्ण की और अपने नाम के साथ 1987 तक जयकिशन जी के नाम को जोड़ा रखा।
हज़ारो कोशिशों के उपरांत भी आलोचक शंकरजी और जयकिशन जी को पृथक ही न कर सके,उन्हें एक नामचीन संगीतकार ने जयकिशन के निधन के बाद नयी जोड़ी बनाने का आग्रह किया तो उन्होंने कहा यह विचार ही आपके दिमाग में कैसे आया की में जयकिशन के बिना जी सकता हूँ,वह आज भी मेरे आसपास है।हमें कोई भी शक्ति विभाजित नहीं कर सकती है।और उन्होंने यह साबित कर दिखाया।
Shyam Shanker Sharma
Jaipur, rajasthan.

Sunday, May 10, 2015

Tribute to Talat Mahmood

By : Nataraj Sarjapur

In 1953 SJ were declared the ' best composers ' by Songs of Yore, a blog I like very much for the unbiased and in depth analysis of HFM from the 30s to 60s. That year 130 songs were short listed as 'best ' and the following are the SJ compositions picked. 
1. SHANKAR JAIKISHAN
Aah
1. Jane na nazar pahchane jigar – Mukesh and Lata Mangeshkar
2. Jo mai jaanati unke liye – Lata Mangeshkar
3. Raat andheri door savera – Mukesh
4. Aja re ab mera dil pukara – Mukesh and Lata Mangeshkar
5. Ye sham ki tanhaiyan – Lata Mangeshkar
6. Sunte the naam hum jinka bahaar se – Lata Mangeshkar
7. Raja ki ayegi baraat – Lata Mangeshkar
8. Chhoti si ye zindagani – Mukesh
Aas
9. Chahe nain churao chahe daman bachao – Talat Mahmood and Lata Mangeshkar
Aurat
10. Ulfat ka saaz chhedo samaan suhana hai – Lata Mangeshkar
11. Dard-e-jigar thahar zara – Lata Mangeshkar
Boot Polish
12. Lapak jhapak tu aa re badarwa – Manna Dey
13. Chali kaun se des gujariya – Talat Mahmood and Asha Bhosle
Mayurpankh
14. Khushiyon ke chad muskaye re – Lata Mangeshkar
15. Mohabbat ki dastaan tum bhi suno – Lata Mangeshkar
Naya Ghar
16. Laga kar dil parishan hain – Lata Mangeshkar
Patita
17. Kisi ne apna bana ke mujhko – Lata Mangeshkar
18. Andhe jahan ke andhe raaste – Talat Mahmood
19. Tujhe apne paas bulati hai – Talat Mahmood
20. Yaad kiya dil ne kahan ho tum – Hemant Kumar and Lata Mangeshkar
21. Mitti se khelate ho baar bar kis liye – Lata Mangeshkar
22. Hain sabse madhur wo geet mere – Talat Mahmood
Shikast
23. Kare badra tu na ja na ja – Lata Mangeshkar
24. Sapnon ki suhani duniya ko – Talat Mahmood


The list has 6 Talat Gems !! Honeydew !! His voice reminds me of meadows, caressing breeze, brooks on rounded pebbles !! The unique 'tremolo ' in his voice, the clear and correct rendition and above all the emotions he brought to his rendition made him very very unique. ' Ae dil mujhe aisi jagah le chal jahaan koi na ho (Arzoo, 1950) ' is the best example of AB and TM songs. Immortal composition. Listening to Talat is eternal peace and tranquility !! RIP Talat Saab.

शंकरजयकिशन के गीत और आध्यत्मिकता

मोहब्बत के खुदा हम है...... by Shyam Shankar Sharma   वर्ष 1968 में शंकरजयकिशन के संगीत से सजी दिल को स्पर्श करने वाली फ़िल्...